Sunday, September 23, 2007

क्या कहता है रमजान का महीना

रमजान का मुबारक महीना धीरे-धीरे अपने शबाब पर पहुंचने जा रहा है। इस महीने में अल्लाह ने सेहमतमंद मोमनीन को रोजा रखने का हुक्म दिया है और रोजे के नतीजे के तौर पर तकवा का जिक्र किया गया है। इसका मतलब यह है कि रोजा अगर अपनी शरतों के साथ रखा जाए तो यकीनन वह इंसान की रूह को पाक करने का बेहतरीन जरिया है। रोजे के साथ-साथ कुछ दुआएं वह हैं जिन्हें रोज पढ़ने की फरमाइश की गई है और कुछ दुआएं वह हैं जो तारीख और दिन की मुनासिबत से हैं। यह दुआएं भी अगर सचमुच दुआ के तरीके पर पढ़ी जाए तो यह रूह की पाकीजगी बढ़ाने का बेहतरीन जरिया है। आमतौर पर हम दुनिया के कामों की तरह दीनी काम भी रस्म के तौर पर अंजाम देते हैं। हमने यह सुन रखा है कि रमजान के महीने में तिलावते कुरआन का बहुत ज्यादा सवाब है और यकीनन एसा ही है। लेकिन सिर्फ अलफाजे कुरआन का जुबान से दोहराना ही कुरआन के नाजिल होने का मकसद नहीं है। चूंकि कुरआन हिदायत की किताब है इसलिए हमे इसकी तिलावत इस अंदाज पर और इस तरह करनी चाहिए कि हमें इसके जरिए हिदायत हासिल हो जाए। यह तभी मुमकिन है कि जब हम कुरआन की तिलावत के साथ-साथ अलफाज के मायने पर गौर करें, सोचे और समझें कि कुरआन हमसे क्या कह रहा है। इसी तरह दुआ पढ़ते वक्त भी फकत दुआ के अलफाज का जुबान पर जारी कर लेना ही काफी नहीं है। बल्कि हमें यह मालूम होना चाहिए कि इस दुआ के जरिए मालिक की बारगाह में क्या कहा गया है। रमज़ान के महीने की फजीलत को बयान करते हुए रसूलुल्लाह ने इरशाद फरमाया है-- -लोगों, तुम्हारी तरफ अल्लाह का महीना बरकत, रहमत व मगफेरत के साथ आ रहा है। यह वह महीना है जो अल्लाह के नजदीक तमाम महीनों से अफजल है। इसके दिन तमाम दिनों से अफजल और इसकी रातें तमाम रातों से अफजल हैं। इसका एक घंटा तमाम घंटों से बेहतर है। इस महीने में तुम्हें अल्लाह की मेहमानी की दावत दी गई है। तुम लोग इस महीने में करामत वाले हो। तुम्हारी सांसे इसमें तसबीह का सवाब रखता है। इसमें अमल कबूल होने वाला, दुआएं कबूल होने वाली है। इसलिए सच्ची नीयत और पाक दिल के साथ उससे दुआ करो कि तुम्हें रोजे रखने और कुरआन की तिलावत करने की तौफीक दे कि अगर कोई शख्स इस महीने में मगफेरत से महरूम हो गया तो उससे ज्यादा बदकिस्मत कोई आदमी नहीं है। इस महीने की भूख और प्यास के जरिए कयामत की भूख और प्यास को याद करो। फकीरों और मिस्कीनों को सदका दो, बुजुरगों का एहतराम करो, छोटों पर रहम करो, रिश्तेदारों से अच्छा सलूक करो, जबान को काबू में रखो, जिस चीज का देखना और सुनना हराम हो उससे आंख-कान को बचाए रखो। लोगों के यतीमों पर मेहरबानी करो ताकि कल खुदा तुम्हारे यतीमों पर रहम करे। गुनाहों से तौबा करो, नमाज के वक्तों में दुआ के लिए हाथ उठाओ यह बेहतरीन मौका है, जिसमें परवरजदिगार बंदों को निगाहे रहमत से देखता है और उनकी दुआ को कबूल करके उनकी आवाज पर लब्बैक कहता है। लोगो, तुम लोग अपने आमाल के हाथों गिरवी हो, इसलिए इस्तेदफार के जरिए अपने को छुड़ा लो, तुम्हारी पीठ पर जो आमाल का बोझ है लंबे सजदों के जरिए उसे उतारो। याद रखो, परवरदिगार ने अपनी इज्जत की कसम खाई है कि नमाजियों और सजदा करने वालों पर अजाब नहीं करेगा और उन्हें कयामत के डर से बचाए रखेगा... जो आदमी इस महीने में अपने अखलाक को सुधार लेगा वह आसानी के साथ सेरात से गुजर जाएगा, जहां लोग बराबर फिसल कर गिर रहे होंगे।... जो अपने शर को रोक लेगा खुदा उससे अपने अजाब को रोक लेगा और जो किसी यतीम का एहतराम करेगा खुदा उसे मोहतरम बना देगा और जो रिश्तेदारों के साथ अच्छा बरताव करेगा खुदा उसे अपनी रहमत से मिला देगा।... लोगों, देखो इस महीने में जन्नत के दरवाजे खुले हुए हैं। खुदा से दुआ करो कि तुम्हारे लिए बंद न होने पाएं और जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए गए हैं कोशिश करो की तुम्हारे लिए खुलने न पाए।

कुछ काम की बातें

रसूलुल्लाह फरमाते हैं... उम्मीद अल्लाह की रहमत है। अगर उम्मीद न होती तो न मां अपने बच्चे को दूध पिलाती और न कोई माली दरख्त लगाता। इल्म सीखने से, हिल्म बर्दाश्त करने से हासिल होता है। जो खैर चाहता है उसको खैर मिलता है और जो शर से बचता है, वह उससे बचा रहता है। जो औरत मर्द की इजाजत के बगैर बाहर निकले तो जब तक घर वापस न आ जाए अल्लाह उससे नाराज रहता है। जो औरत बिला वजह मर्द से तलाक मांगे उस पर जन्नत की खुशबू हराम है जो औरत मर जाए और उसका शौहर उससे खुश रहा हो वह जन्नत में जाएगी।

Saturday, September 15, 2007

`Roza Iftar party'

A lot has been written about politically motivated Iftar parties. I, too, don't like such parties. However, I was terribly impressed by an Iftar party that was held in a temple in "Ayodhya" by the seers of that temple to offer Iftar to Muslim brethren . I had composed this poem a few years earlier but like to repeat it every year in the holy month of Ramadan. Your views on the poem are most welcome. Jawaid Badauni NAZM: "Mulla" ne roza khola hai "Sadhu" ke haath se" Yaro! Ayodhia me(n) na thi kal jo dastyaab Lo aaj baT rahee hai wohee pyaar ki sharaab Hoti hai gul.sitaa(n) me(n) mahak jin ki lajawaab Mandir me(n) khil rahe hai(n) mohabbat ke woh gulab Ghar per pujariyon ke hai ifatr-e ahl-e som Hai mezbaa(n) azaa(n) ki sadaa ki, sadaa-e Om Daavat yeh rozedaaro(n) ki mandir ki yeh zameen Hai(n) mezbaan "Sant" to mehmaN haiN ahl.e deen Mandir me(n) aaye ahl-e haram banke hazreen Sakte me(n) aa gaye hai(n) zamaane ke nazereen Hairat sabhi ko hoti hai Hairat ki baat se "Mulla" ne roza khola hai "Sadhu" ke haath se Duniya me(n) bus wafaa hi mohabbat ka hai badal Taqdeer ne dikhaya hame(n) aaj yeh mahal Tareekhh se kaho keh bhula de na iss ko kal "Sadhu" pila raha hai "Namazi" ko "Ganagajal" Iftariyo(n) ko dekh ke har shakhs dung hai Phal aur mithaiyo(n) me(n) mohabbat ka rung hai Kyoo(n) khoosh "Wafa" na ho keh masarrat ki hai yeh baat Mandir me(n)jake dee hai "Siyasat" ko uss ne maat LaRhte the kal jo aaj woh baithe(n) hai(n) sath saath Ahle haram ke sar pe "Pujari" ne rakhkha haath ? Kuchh ke khooshi me(n) aankh se aansu nikal gaye Aise bhi kuchh the jinke kaleje hi jal gaye Ab woh kareNge kaise ta.assub ka aHtmaam Jab ek ho rahe hai(n) mohibbe Raheem.O.Ram Aazaad ho rahe hai(n) jo nafrat ke the ghulaam Kaise laRhaane walo(n) ka baaqi rahega naam Mana ke aaj ahl-e wafa shaad ho gaye "Jawaid" hosh ahl-e siyasat ke kho gaye Difficult words: dastyaad: available ahl.e som: those who observe fast ahle haram: Muslims, those who belong to K'aba Shareef hazreen: visitors nazreen: viewers mahal: mauqa iftaariyaN: Fruits and other eatables taken to break the fast taAssub: communal feelings ahl.e siyasat: politicians